मामलों से निपटना
धारा 2 के अधिकार
धारा 2 की नोटिस क्या है?
दण्डनीय न्याय अधिनियम, 1987 की धारा 2 के तहत निदेशक द्वारा अधिकृत कर्मचारियों को यह अधिकार है कि वे किसी जांच-पड़ताल के प्रयोजन से किसी व्यक्ति को प्रश्नों का उत्तर देने, किसी सूचना प्रदान करने या दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए कहें। जब हम इन अधिकारों का उपयोग करते हैं तो एक लिखित नोटिस देते हैं। अत्यन्त ज़रूरी मामलों में हम नोटिस के शीघ्र अनुपालन के लिए कह सकते हैं।
SFO जांचकर्ताओं को शीघ्र और कुशलतापूर्वक सूचना प्राप्त करने की जरूरत होती है। इससे जांच-पड़ताल में लगने वाले समय और अंततः अपराधी के विरुद्ध मुकदमा आरम्भ किए जाने की गति में कमी आती है।
धारा 2 का नोटिस किसे दिया जाता है?
धारा 2 के कई नोटिस उन बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, लेखाकारों और अन्य पेशेवरों को जारी किए जाते हैं, जिनके पास अपने व्यवसाय के सामान्य काम-काज के सिलसिले में किसी संदिग्ध धोखा-धड़ी से संबंधित जानकारी या दस्तावेज़ हो सकते हैं।
अधिकांश मामलों में संस्थाओं और व्यक्तियों का यह कर्तव्य होता है कि वे अपने ग्राहकों के प्रति गोपनीयता का पालन करें। उनमें से कई लोग सहायता करने के इच्छुक होते हैं पर गोपनीयता के इन कर्तव्यों के कारण वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। धारा 2 का नोटिस उन्हें सूचना और दस्तावेज़ देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करता है।
इन अधिकारों का उपयोग कब किया जा सकता है?
धारा 2 के अधिकारों का उपयोग सिर्फ किसी ऐसे संदिग्ध अपराध की जांच-पड़ताल के उद्देश्य से किया जा सकता है, जिसमें निदेशक को उचित कारणों से ऐसा लगता है कि यह कोई गम्भीर या जटिल धोखा-धड़ी है और जहां किसी व्यक्ति के मामलों या मामलों के किसी पहलू की जांच-पड़ताल करने के उद्देश्य से ऐसा करने के उचित कारण हों।
इन पर क्या प्रतिबंध हैं?
यदि किसी व्यक्ति के पास ऐसा न करने का कोई उचित कारण हो, तो वह प्रश्नों का उत्तर देने या सूचना या दस्तावेज़ प्रदान करने से मना कर सकता है।
धारा 2 के अंतर्गत मांगे गए प्रश्नों के उत्तरों का उनके विरुद्ध उनके मामले में प्रमाण के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता, बशर्ते कि मुकदमा धारा 2 के साक्षात्कार के दौरान भ्रामक सूचना देने के अपराध से संबंधित न हो।